कलाकार और किस्से: लता मंगेशकर का शानदार और सुहाना सफर

सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर आज अपना 90वां जन्मदिन मना रही हैं। स्वर कोकिला यानि लता मंगेशकर का उनके जीवन में उनकी बहन ऊषा का सबसे बड़ा योगदान रहा है।

By: कोमल गौतम | Updated: 28 Sep 2019 03:12 PM
Bollywood Lata Mangeshkar interesting facts and untold story
एंटरटेनमेंट डेस्क। लता मंगेशकर एक ऐसा नाम जो किसी पहचान मोहताज नहीं, अपनी सुरिली आवाज से दिलों को छु जाने वालीं लता मंगेशकर आज अपना 90वां जन्मदिन मना रही हैं। उनके जन्म दिन पर आइए जानते हैं लता दीदी की वो अनसुनी कहानी जो शायद ही आपने सुनी या कहीं पढ़ी होगी। लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। इनके पिता दीनानाथ मंगेशकर, प्रतिभाशाली शास्त्रीय गायक और थिएटर अभिनेता थे और माँ शुधमती थी, जोकि माई के नाम से भी जानी जाती थी। 1962 की बात है। एक फिल्म आई थी बीस साल बाद, बीस साल बाद के एक गाने को रिकोर्ड करने से पहले लता जी हो गई बीमार। फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर हेमंत कुमार जी गीत रिर्कोर्ड करने के लिए तैयार थे। सब कुछ रैडी हो गया था, लेकिन लता जी रिकोर्डिंग के लिए नहीं आ पाई। दरअसल हुआ ये था की एक दिन जब लता जी सुबाह सो कर ऊठी तो उनको ये लगा की मेरी तबीयत कुछ ठीक नही है। पेट में दर्द था उनको ये लगा थोड़ा अराम करके मेरी तबीयत ठीक हो जाएगी, लेकिन जैस-जैसे दिन बीत रहें थे वैसे-वैसे हालत बिगढने लगी थी। अचानक उनको उल्टी होने लगी। डॉक्टर को घर पर बुलाया गया और जब डॉक्टर ने चेकअप किया को डॉक्टर परेशान हो गए। फिर डाक्टर ने कहा उनके परिवार वालो को की इनको खाने में  दिया जा रहा है। ज़हर दिया जा रहा है। आप अंदाजा लगा सकते है परिवार वालो की क्या हालात हो रही होगी। ये खबर सुन कर उनकी छोटी बहन ऊषा ने एक फैसला लिया की उनके लिए कोआ खाना नहीं बनाएगा वो खुद उपनी बड़ी बहन के लिए खाना बनाएगी। लता जी को वापस ठीक होने में पूरे 3 महिने लगे थे। उनका घर पर ही इलाज हुआ और उनके इलाज के दौरान उनके एक दोस्त ने बहुत साथ दिया और वो थे शायर गीतकार मज़रुह सुल्तानपुरी। मज़रुह साहब रोज शाम 6 बजे के करीब उनके घर पहुंच जाते थे। घंटो तक अनको कविता सुनाते, शायरी सुनाते, गप्पे मारते थे। मजरुह साहब तीन महिने तक रोज आते और तब तक ये सिलसिला जारी रहा जब तक वो एकदम फिट नही हो गई। 3 महिने के बाद जो उन्होनें पहला गीत गाया वो था हेमंत कुमार जी की फिल्म 20 साल बाद और गानो के बोल थे कही दिप जले कही दिल।



संगीतकार सी रामचंद्र ने इस किस्से का जिक्र अपनी किताब में किया है क्योकि वो इस घटना के चशमदीद गवाह भी थे। एक बार लता जी और श्री राम चंद्र फिल्म झांझर के संगीत तो लॉन्च  करने के सिलसिले में अमृतसर पहुंचे। अमृतसर पहुंचने के बाद बातो ही बातो में जिक्र छिड गया लाहौर का पाकिस्तान का बातों ही बातों में लता जी को नूरजहां जी की याद आ गई। नूरजहां अपने पती के साथ पाकिस्तान में रहने लग गई। लता जी ने कहा मुझे नूरजहां जी से बात करनी है। दोनो की बात कराई गई और ये फोन कॉल का सिलसिला तकरीबन 1 घंटा चला। एक और मज़े की बात दोनो ने एक दूसरे को गाने गा कर भी सुनाए। जब बात करने का सिलसिला खत्म हुआ तो लता जी ने रामचंद्र जी से कहा मुझे इन से मिलना है। चंद्रजी ने कहा अभी नहीं मिल सकते पाकिस्तान जाने के लिए पासपोर्ट चाहिए होता है। लेकिन लता जी जिद पर आ गई। फिर जैसे-तैसे कर के दोनो को बाघा बोर्डर पर मिलवाया गया।



लता जी 40 के दशक में उस समय के लगभग सारे संगीतकारो के लिए गीत गा रही थी, लेकिन अभी भी एक ऐसा म्यूजिक डायरेक्टर बाकी था जिस के म्यूजिक डायरेक्शन में उन्होने कोई काम नहीं किया था और उनका नाम था नोशाद साहब।



लता जी मुकेश जी को भइया बुलाती थी। एक दिन दोनो की मुलाकात हुई। मुकेश जी घर आए बोले अभी तुम्हे मेरे साथ चलाना है। नोशाद जी तुमसे मिलना चाहते है। अपनी फिल्म के लिए तुमसे गाना गवाना चाहते है। लता जी के नोशाद की फिल्म में गाने के लिए ऑडिशन देना था, लेकिन लता जी ने ऑडिशन देने के लिए मना कर दिया था। उनका ये कहना था की अगर नोशाद साहब को मुझ से गाना रिकोर्ड करवाना है तो सीधा ही करवाए मैं ऑडिशन नही दूंगी। नोशाद जी ने एक तरीका निकाला जब लता जी मुकेश जी के साथ कारदार स्टूडियो पहुंची तो नोशाद साहब ने बड़ी ही चतुराई से लता से कहा, लता जी मैंने आपको कई बार सुना है। आप बहुत अच्छा गाती है। मुझे आपके सिंगिंग टैलेंट पर कोई शक नहीं है। बस में आपका उर्दू का तलफूज़ देखना चाहता हूं, क्योकि मेरी अगली फिल्म के गाने में उर्दू के अलफाज़ का ज्यादा इस्तेमाल किया जाएगा। इस लिए आप मुझे कोई गज़ल सुना दीजिए। एक इंटरव्यू में लता जी ने इस बात को बताते हुए कहा। इस बात पर अब उनको समझ नहीं आ रहा था की वो नौशाद साहब को मना कैसे करें। नौशाद साहब ने इस तरह बात की मना करना बहुत ही मुशकिल था। तब मजबुरी में लता जी को फिल्म लाहोर की एक गजल उनको सुनानी पड़ी। गज़ल सुन ने के बाद नौशाद साहब बहुत खुश हुएऔर इस तरह लता जी ने नौशद साहब के साथ पहला गाना गाया। उस गाने के बोल थे ‘हाय छोरे की जात बडी बेवफा’ फिल्म का नाम चांदनी रात।



फिर उनके बाद लता जी ने ‘’ए मेरे वतन’’ गाया। मगर ये गीत लता जी से पहले ऑफर किया गया था आशा भोसले को ये बात है 26 जनवरी 1963 की राम लीला मैदान दिल्ली में रखा गया था और इस के लिए नौशाद जी शंकर जेय किष्ण और मदन मोहन जी को उनके गाने के साथ गाने के लिए बुलाया गया। नोशाद साहब ने प्रदीप जी को कहा के भई देश भक्ति का एक गाना  शहीदो की कुरबानी पर लिख डालिए। प्रदीप जी ने गीत लिखा, आप हैरान होगे ये बात सुन कर प्रदीप ने इस गाने के लिए 100 अंतरे लिखे थे। इस में से 5 6 अंतरे फाइनल कर लिए। श्री राम चंद्र और लता जी उन दिनों साथ काम नही कर रहें थे। तो ग्रेट श्री राम चंद्र ने आशा जी से इस गाने को गवाने का फैसला लिया मगर एक दिन प्रदीप जी ने राम चंद्र को फोन पर बताया की आपकी और लता जी की अनबन है लेकिन मैंने जब लता जी से बात की तो लता इस गीत को गाने के लिए तैयार है। फिर उसके बाद राम चंद्र ने एक फैसला लिया कि ये गाना में दोनो से साथ गवाउगा।



23 जनवरी को आशा जी और लता जी दोनो पहुंच गई राम चंद्र के यहां रिहसल करने और इस से पहले दोनो रिहसल शुरू करती लता जी ने आशा जी से कहा आशा तुम राम चंद्र को क्यो नहीं बताती की तुम्हारी तबीयत ठीक नही है और तुम दिल्ली नही जा सकती। लता जी के ऐसे कहने पर आशा भोसले जी राम चंद्र को बाहर बुलाया और इस गाने को गाने से मना कर दिया। श्री राम चंद्र जी ये समझ नहीं पाए उनको कहने लगे तुम जानती हो मैं ये गाना असल में तुम से ही गवाना चाहता था। लता तो बाद में आई तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, कैसे पिछे हट सकती हो, लेकिन आशा नही मानी वो वहा से चली गई। श्री राम चंद्र को बुरा तो बहुत लगा उन्हे पता था की आशा अब मानेगी नही। मगर एक सवाल मन में बना रहा आखिर आशा इस गीत को गाने के लिए क्यो राज़ी नही हुई।



लता जी को पहली बार सोलो गीत गाने का मौका मिला था। 1948 की फिल्म जिसका नाम था जिद्दी। जिंदगी का आसरा समझे बडे नादान थे हम समझे भी तो क्या, लेकिन उन्हे इस सोलो गीत के लिए क्रडिट नही मिला। उनकी जगह रिकॉर्ड में नाम आया था आशा।आपको बता दे आशा से आशा भोसले नही बल्कि जिद्दी फिल्म की हिरोइन कामनी कोशल का सिक्रन नाम था। हुआ यू था कामनी कोशल की अवाज में थोड़ा तीखापन था। जनता ने ये गीत सुना तो उन्हे लता की अवाज में भी वैसा ही तीखापन लगा जै, की कामनी की अवाज में था। इसी गलत फैमी के चलते रिकोर्डिग कंपनी ने ये समझ लिया के गीत लता ने नही बल्कि आशा यानि की यामनी कोशल ने गाया है। इस लिए रिकोर्ड पर नाम आया आशा। ये गाना उस ज़माने में काफी हिट भी हुआ था।