मध्यस्थता समिति की कवायद से राम मंदिर पर फैसले में हुई देरी?

मनीष नेगी | 02 Aug 2019 06:12 PM

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर राम भक्तों का इंतजार फिर बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ही इस मामले में सुनवाई के बाद फैसला सुनाएगा ये साफ हो गया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच सदस्यों की बेंच ने पाया कि इस मामले में बनी मध्यस्थता कमेटी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। सियासी लिहाज से अयोध्या विवाद कितना संवेदनशील ये छिपा नहीं है। हालांकि कोर्ट की कोशिश थी कि इस मसले का निपटारा आपसी रजामंदी से हो जाए, लेकिन इतने सालों पुराने विवाद का निपटारा चंद दिनों की कवायद में मुमकिन नहीं था। ये कोर्ट ने भी मान लिया है... इसलिए हर हफ्ते सुनवाई का फैसला किया है।


ये फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि बेंच की अगुवाई कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई इसी साल 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले इस मामले पर कोई ऐतिहासिक फैसला सुना दें, हालांकि कोर्ट ने ये साफ नहीं किया है कि सुनवाई कब तक चलेगी। वहीं दूसरी तरफ भाजपा, साधु संतों और दूसरे हिंदूवादी संगठनों को लगता है कि इस विवाद में फैसला आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। क्योंकि मसले के सभी पहलुओं पर मुमकिन रास्ते तलाशे जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शनिवार को अयोध्या पहुंच रहे हैं। जहां कई योजनाओं के निरीक्षण के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब योगी आदित्यनाथ भगवान राम की मूर्ति के प्रस्तावित स्थल को देखेंगे यानी अयोध्या को लेकर माहौल गरम हो गया है।


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देश के सबसे चर्चित और सालों पुराने अयोध्या मामले में इंसाफ के लिए...अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करना होगा। अब इसमें फैसला सुप्रीम कोर्ट ही सुनाएगा और इसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत बकायदा हर हफ्ते सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की बेंच ने ये आदेश सुनाया है।


इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई मध्यस्थता कमेटी 155 दिन बाद भी इस मामले का हल ढूंढने में कामयाब नहीं हो पाई। कोर्ट के मुताबिक मध्यस्थता समिति को जिस उम्मीद से बनाया गया। वो उस पर खरी नहीं उतर पाई । बेंच की अगुवाई कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा है कि मध्यस्थता समिति किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है


साफ है कि अब इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ही अपना फैसला सुनाएगा। इससे पहले 18 जुलाई को इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता कमेटी को 1 अगस्त को अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा था। जिसमें तय किया गया था कि इस मामले की सुनवाई के लिए रुपरेखा रिपोर्ट के आधार पर तय की जाएगी। इसके बाद आज हुई सुनवाई में कोर्ट ने अपना रूख तय किया है। कोर्ट के इस आदेश के बाद हिंदू पक्षकारों में नई उम्मीद जगी है।


कोर्ट में सुनवाई के दौरान मौजूद रहने वाले सुब्रमण्यम स्वामी का भी मानना है कि तकरीबन 100 साल पुराना ये मामला अब निर्णायक मोड़ पर है। आठ मार्च को उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद का बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए मध्यस्थता पैनल का गठन किया था। इससे पहले भी कोर्ट के आदेश पर इस मसले को लेकर दोनों पक्षों में कई राउंड बातचीत की कई कोशिशें हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। वहीं पिछली मोदी सरकार पर साधु संतों और संघ की तरफ से लगातार दबाव था कि सरकार इस मसले का हल अध्यादेश के ज़रिए निकाले, लेकिन पीएम ने इसी साल की शुरुआत में साफ कर दिया कि...उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले इसे लेकर कोई पहल नहीं करेगी।


सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले का हल निकालने के लिए मध्यस्थता समिति को कुल 155 दिन दिए। इसके बावजूद अब उसे खुद इस मामले की सुनवाई करनी होगी। फैसला भी कोर्ट को सुनाना है। ऐसे में उसका फैसला दोनों पक्षों को मंजूर करना होगा। उधर दूसरी तरफ चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का कार्यकाल 17 नवंबर को खत्म हो रहा है। सवाल यही है कि क्या पहले मध्यस्थता समिति की कवायद से फैसले में हुई देरी ?
क्या दिवाली तक जगमग हो जाएगी अयोध्या में मंदिर की राह?
और आखिर में क्या राम मंदिर पर सीजेआई गोगोई अपने कार्यकाल में ही रचेंगे इतिहास?