क्या बबुआ के फैसले से पहले बुआ ने चल दिया दांव?

एबीपी गंगा | 04 Jun 2019 05:48 PM

कुछ तो मजबूरियां रही होगीं... यूं कोई गठबंधन नहीं होता और ना ही टूटता है। वजूद बचाने की मजबूरी में उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा में गठबंधन हुआ और जब नतीजों के बाद सपा का वजूद खतरे में आ गया तो बसपा ने गठबंधन से अलग राह पकड़ ली। दिलचस्प बात ये है कि गठबंधन से पहले खतरा बसपा के वजूद पर था और गठबंधन के बाद आए लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सपा के वजूद को खतरे में डाल दिया, लेकिन मोदी के दूसरे दौर की सूनामी ने जख्मी दोनों ही पार्टियों को किया। अब ये वक्त तो एक दूसरे को तसल्ली देने नया हौसला भरने का था, लेकिन जो सपा-बसपा में जो चल रहा है उसके लिए किसी शायर ने कुछ यूं कहा है कि क्या खूब किया तूने मेरे जख्मों का इलाज मरहम भी लगाया तो कांटों की नोंक से जी हां एबीपी गंगा को मिल रही जानकारी के मुताबिक अखिलेश यादव पहले ही बसपा से अलग होने की जुगत लगा रहे थे, लेकिन मायावती को भनक लग गई और उन्होंने पहले दांव चल दिया। अखिलेश और मायावती दोनों ही दम भरते हैं जनता का देश का...संविधान का, लेकिन हकीकत हम सब जानते हैं ऐसे में सवाल ये है कि


-क्या बबुआ के फैसले से पहले बुआ ने चल दिया दांव?
- सवाल ये भी है कि गठबंधन के वक्त परिवार की फूट की अनदेखी क्यों?
- किसी नए समीकरण की खातिर गठबंधन से किया गया है किनारा?


आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी की भविष्यवाणी सच साबित हुई... गठबंधन में नौबत कपड़े फाड़ने की तो नहीं आई... लेकिन बुआ और बबुआ के रिश्ते 143 दिनों में ही तार-तार हो गए। लोकसभा चुनावों में 75 सीटों की गणित 15 सीटों पर क्या सिमटी, गठबंधन की गांठें ही खुल गईं। भतीजे और बुआ की राहें अलग हो रही हैं, इसके संकेत मायावती ने सोमवार को ही दे दिये थे। जब उन्होने 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव अकेले ही लड़ने का फैसला किया और अखिलेश ने एक बार फिर बुआ के फैसले का सम्मान करते हुए अलग राह पर चलने का ऐलान कर दिया।


रिश्ते टूटने से पहले दलीलें भी बड़ी रोचक हैं। पारिवारिक झगड़े के बावजूद हुए गठबंधन में अब सवाल परिवार को लेकर ही है। तो क्या अब विधानसभा उपचुनाव के जरिये एक बार फिर दोनों दल यूपी में नया राजनीतिक प्रयोग करने के लिए तैयार हो गए हैं। 2022 में सत्ता में वापसी का दावा करने वाले अखिलेश माया से अलग होकर फिर कांग्रेस का साथ लेंगे...क्योंकि मायावती के रहते लोकसभा चुनाव में ये मुमकिन न हो सका... तब भी जब सपा कार्यकर्ताओं ने बसपा के साथ गठबंधन का उत्साह नहीं दिखाया।


10 सीटों की जीत और सपा से ज्यादा मुस्लिमों के वोट ने मायावती को रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। यही वजह है कि उपचुनावों में मायावती को अकेले उतरने का एलान करना पड़ा या फिर बीजेपी की बढ़ती ताकत को देखते हुए मायावती ने सपा से दूरी बनाकर नए संकेत दिए हैं। अब तक उपचुनावों से कतराती रहीं माया अब बड़ा क्षत्रप बनने की तैयारी में है, लेकिन भाजपा का कहना है कि दोनों नेता स्वार्थ की वजह से एक साथ आए थे, जिसका ऐसा ही अंत होना था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाकर यूपी में कमाल दिखाने की सोच रहे अखिलेश को लगा झटका उन्हें सबक नहीं दिखाया। हालांकि मुलायम सिंह यादव ने भी पहले ही अखिलेश को चेताया था, कि बसपा के साथ जाना सपा को ही नुकसान होगा.. और हुआ भी ठीक वैसा ही... ऐसे में अब सवाल उठता है कि क्या 10 सीटें हासिल करके मायावती ने अखिलेश से पहले ही गठबंधन तोड़ने का दांव चल दिया... मायावती सपा की पारिवारिक झगड़े को हार की वजह बता रही हैं वो उन्हे पहले क्यों नहीं दिखाई दी... और क्या सपा और बसपा अब किसी नए समीकरण की तैयारी में हैं।